श्री बंशीधर नगर: पर्व-त्योहार को लेकर श्री बंशीधर नगर में खाद्य सुरक्षा विभाग की जांच और कार्रवाई के बावजूद बाजार में खाद्य सुरक्षा को लेकर कई सवाल सामने आ रहे हैं। जांच के बाद भी कई स्थानों पर मिठाइयां खुले में रखकर बेची गईं। खुले में रखी मिठाइयां धूल, गंदगी और मक्खियों के संपर्क में आती रहीं, जबकि बारिश और उमस के मौसम में लंबे समय तक इस तरह खाद्य पदार्थों का खुले में रखा जाना उनकी स्वच्छता और गुणवत्ता पर सवाल खड़ा करता है। नामी-गिरामी दुकानों पर भीड़ भी सामान्य से कहीं अधिक दिखाई दी। जहां करीब 50 लोगों के खड़े होने की जगह थी, वहां 100, 200 से लेकर 500 तक लोगों की भीड़ देखी गई। ऐसे में मिठाइयों के रख-रखाव, स्वच्छता और इतनी भीड़ के बीच खाद्य पदार्थों की शुद्धता सुनिश्चित करने की व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। उपभोक्ताओं के सामने असमंजस की स्थिति बनी रही कि जांच के बाद आखिर किन आधारों पर किसी प्रतिष्ठान को सही माना गया और क्या वास्तव में सभी जरूरी मानकों की पूरी तरह जांच हुई। खाद्य सुरक्षा विभाग की ओर से की गई कार्रवाई में दो मिठाई कारखानों को सील किया गया तथा संदिग्ध मिठाइयों को नष्ट कराया गया। कुछ प्रतिष्ठानों से खाद्य पदार्थों के नमूने भी जांच के लिए लिए गए। कार्रवाई से यह स्पष्ट हुआ कि कुछ स्थानों पर खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और स्वच्छता को लेकर गंभीर कमियां मिली थीं। लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि जिन प्रतिष्ठानों को जांच के बाद कारोबार जारी रखने की अनुमति मिली, वहां स्वच्छता, मिठाइयों के रख-रखाव, खुले में बिक्री और ग्राहकों की अत्यधिक भीड़ जैसे पहलुओं की जांच किस स्तर तक हुई।
सबसे बड़ा सवाल उस कारखाने को लेकर है, जिसे जांच के बाद सील कर दिया गया। यदि उस कारखाने में तैयार मिठाइयों की गुणवत्ता पर सवाल उठे और कारखाने को सील करने की कार्रवाई की गई, तो उससे पहले वहां तैयार होकर बाजार में पहुंच चुकी मिठाइयों का क्या हुआ? क्या उन मिठाइयों को बाजार से वापस मंगाने की कोई व्यवस्था की गई? क्या दुकानदारों और उपभोक्ताओं को इसकी जानकारी दी गई? या फिर कारखाने को सील करने की कार्रवाई के बाद ही पूरी प्रक्रिया समाप्त मान ली गई? यदि संदिग्ध उत्पाद पहले ही लोगों के घरों और दुकानों तक पहुंच चुके थे, तो उनकी सुरक्षा को लेकर विभाग की आगे की जिम्मेदारी क्या रही, यह स्पष्ट होना जरूरी है।
बाहर से मंगाकर बेची जाने वाली मिठाइयों को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। उनके निर्माण की तारीख, निर्माण स्थल, स्रोत और इस्तेमाल किए गए खाद्य रंगों की जांच हुई या नहीं, इसकी जानकारी उपभोक्ताओं के सामने आनी चाहिए। इसी तरह किसी प्रतिष्ठान से एक नमूना लिए जाने के बाद उसी स्थान पर बिक रहे अन्य खाद्य पदार्थों की जांच किस प्रकार की गई, यह भी महत्वपूर्ण सवाल है।
जांच के बाद बाजार में मिठाइयों की बिक्री और कीमतों को लेकर भी उपभोक्ताओं में चर्चा है। लोगों का कहना है कि खाद्य सुरक्षा जांच का उद्देश्य केवल कुछ नमूने लेना या किसी प्रतिष्ठान पर कार्रवाई करना नहीं, बल्कि बाजार में बिक रहे खाद्य पदार्थों की वास्तविक सुरक्षा सुनिश्चित करना होना चाहिए। स्थानीय लोगों का कहना है कि त्योहारों के दौरान एक-दो दिन की जांच से खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो सकती। मिठाई कारखानों, दुकानों, होटलों और अन्य खाद्य प्रतिष्ठानों की नियमित जांच जरूरी है। साथ ही जांच के बाद कार्रवाई का पालन हुआ या नहीं, इसकी भी दोबारा जांच होनी चाहिए।
अब सवाल यह है कि खाद्य सुरक्षा की जांच में किन-किन मानकों को आधार बनाया गया, कितने नमूने लिए गए, उनकी जांच का परिणाम क्या रहा और सील किए गए कारखानों में तैयार मिठाइयों के बाजार में पहुंच जाने के बाद विभाग ने क्या कदम उठाए। इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आने पर ही उपभोक्ताओं का भरोसा कायम हो सकेगा।
