केतार(गढ़वा):शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर प्रखंड के विभिन्न पूजा पंडालों में श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। मां दुर्गा की आराधना के बीच श्रद्धालुओं ने गाजे-बाजे के साथ कलश यात्रा निकाली।राबर्ट्सगंज से आए आचार्य श्री सौरभ भारद्वाज एवं दीपेंद्र विद्यार्थी ने वैदिक मंत्रोच्चार और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच कलश स्थापना कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद परंपरानुसार बेलवा अधिवास का अनुष्ठान संपन्न हुआ, जिसके साथ मां दुर्गा के पट खुलने और उनके दिव्य स्वरूप के दर्शन का श्रद्धालुओं को बेसब्री से इंतजार रहा। धार्मिक परंपराओं के निर्वहन के साथ पूजा समितियों की ओर से मां दुर्गा की आराधना की गई और क्षेत्र की सुख-समृद्धि, शांति तथा खुशहाली की कामना की गई। मां दुर्गा के पट खुलते ही पूजा पंडालों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। मां के दिव्य और मनोहारी स्वरूप का दर्शन कर भक्त भावविभोर हो उठे। पंडालों में गूंजते ‘जय माता दी’ के जयकारे, शंखध्वनि और घंटियों की आवाज से पूरा क्षेत्र गुंजायमान हो गया। श्रद्धालुओं ने मां के चरणों में शीश झुकाकर परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और मंगलमय जीवन की प्रार्थना की।
संगीतमय श्री राम कथा में मंत्र मुग्ध हुए भक्तगण
प्रखंड के मुकुंदपुर में आयोजित मां दुर्गा पूजा महोत्सव में प्रत्येक दिन संगीतमय श्रीराम कथा का आयोजन किया गया।मुख्य अतिथि क्षेत्र के समाजसेवी पंकज कुमार सिंह ने फीता काटकर कार्यक्रम का शुभारंभ किया।उन्होंने समस्त लोगों को दुर्गा पूजा एवं दशहरा का शुभकामना दिया एवं आपसी भाईचारा एवं सौहार्दपूर्ण तरीके से दुर्गा पूजा एवं दशहरा मनाने की अपील किया।उन्होंने मां शेरोवाली से अपने क्षेत्र में अमन-चैन, सुख समृद्धि का आशीष मांगा।संगीतमय श्रीराम कथा के दौरान कथा व्यास आचार्य श्री सौरभ भारद्वाज जी ने अहिल्या प्रसंग का अत्यंत मनमोहक और भावुक वर्णन किया। कथा के दौरान उन्होंने भारतीय संस्कृति की उन पांच अमर नारियों—जिन्हें ‘पंचकन्या’ के रूप में स्मरण किया जाता है,का भी विशेष रूप से जिक्र किया।प्रवचन के दौरान उन्होंने कहा प्रभु श्रीराम के चरणों की धूल मात्र से किस प्रकार पत्थर बनी अहिल्या का उद्धार हुआ और उनका जीवन आलोकित हो उठा।उन्होंने कहा कि अहिल्या का चरित्र समाज को क्षमा, तपस्या और भगवान की शरणागत होने का गूढ़ संदेश देता है।प्रवचन के दौरान आचार्य जी ने अहिल्या, तारा, मंदोदरी, द्रौपदी और कुंती—इन ‘पंचकन्याओं’ के ऐतिहासिक एवं पौराणिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने रेखांकित किया कि सनातन परंपरा में इन पांचों नारियों का स्मरण नित्य प्रातः स्मरण के रूप में किया जाता है, जो विपदाओं और विकट परिस्थितियों में भी धर्म, धैर्य और आत्मबल का प्रतीक हैं। श्रद्धालुओं को भाव-विभोर हो गए और पूरा पंडाल “श्री राम जय राम जय जय राम” के जयकारों से गूंज उठा।

